मन एक ऐसा चंचलतापुर्ण सागर हैं, जो कभी कहीं तो कभी कहीं भटकता रहता हैं। इसका पार पाना उतना ही कठिन हैं जितना की किसी लोमड़ी अंगुर मिलना। हाँलांकि लोमड़ को अंगुर मिल भी जाये पर मन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता हैं। बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी इसे अपने वश में न कर सके। फिर भी कइयों ने इसे साधा हैं और प्रभू/ईश्वर को पाया हैं। मन अपने आप में ही एक विचार हैं, जिसका निरूपण भावनाओं पर आधारित हैं।
गीता जी में मन को 11वीं इन्द्रि माना जाता है, जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच नियामक का काम करता है। ये इन्द्रियां और मन हमारे ज्ञान और कर्म के साधन मात्र न होकर इस संसार को भोगने के भी साधन हैं। संसार का सुख भोगने में मन विचार और कल्पना के द्वारा भी सहायता करता है।
मनुष्य का मन संसार की सबसे अशांत चीज है। इस अशांति के कारण ही मनुष्य संसार में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के साधनों की तलाश में भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य को अपनी इच्छा की एक वस्तु मिलती है उसका अशांत मन तुरंत किसी दूसरी चीज की तलाश में दौड़ने लगता है।
यदि हम मन की सीमा को जानकर उसके ऊपर उठ सकें तो हम बुद्धि की अवस्था पर पहुंच सकते हैं। और यह बुद्धि हमें निचता से उच्चता की ओर ले जा सकती हैं।
व्यक्ति को जीवन में केवल मन पर ही आधारित नहीं होना चाहीए, क्योंकि मन में उत्पन्न भावनाएँ हमेशा सही नहीं होती हैं। बल्कि उसको अपने कर्म को प्रधानता देनी चाहीए।
वर्तमान समय में बच्चों से लेकर माता-पिता भी मन के वशिभुत हो गये हैं, जिससे जीवन में मुल्यों(जीवन मुल्यों) की कमी आई हैं और अर्थ(धन) को प्रथमिकता दी जा रही हैं। जिसनें आधुनिकता को तो बनाये रख रखा हैं परन्तु भविष्य को उजाड़ दिया हैं। आने वाले समय में मानवता मर चुकी होगी और व्यक्ति में पाप भरा पड़ा होगा जिसकी शुरूआत हो चुकी हैं।
व्यक्ति को मन को नियंत्रित करना चाहिए जो की केवल अभ्यास से हो सकता हैं। तथा जीवन मुल्यों को समझना चाहिये। बच्चों को भी केवल अर्थपुर्ण पढ़ाई ही नहीं करनी चाहिये अपितु आध्यात्म को भी समझना चाहिए। और अपने चित्त को बुराई से हटा कर अच्छाई की ओर लगाना चाहिए।
आधुनिक समय में मोबाइल एक ऐसी युक्ति बन गयी हैं जो केवल व्यक्ति को ओर ही ले जाती हैं, अतः इसका प्रयोग भी सावधानी से करना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों से इस यंत्र को दूर रखना चाहिए साथ ही यदि किसी का बच्चा इसका अधिक उपयोग कर रहा हैं तो उसका छिप कर या किसी अन्य माध्यम से परिक्षण करना चाहिए। पुस्टि हो जाने पर ही उसको(बच्चे को) छुट देनी चाहीए। अन्यथा उसमें विकारों के अलावा ओर कुछ भी नहीं पनपेगा।
आधुनिक समय में शिक्षा मे मोबाइल की जितनी आवश्यकता हैं उतने ही दुष परिणाम भी हैं अतः इसका उपयोग सतर्कता पुर्वक करें।


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