मन एक ऐसा चंचलतापुर्ण सागर हैं, जो कभी कहीं तो कभी कहीं भटकता रहता हैं । इसका पार पाना उतना ही कठिन हैं जितना की किसी लोमड़ी अंगुर मिलना । हाँलांकि लोमड़ को अंगुर मिल भी जाये पर मन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता हैं । बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी इसे अपने वश में न कर सके । फिर भी कइयों ने इसे साधा हैं और प्रभू/ईश्वर को पाया हैं । मन अपने आप में ही एक विचार हैं, जिसका निरूपण भावनाओं पर आधारित हैं । गीता जी में मन को 11वीं इन्द्रि माना जाता है, जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के बीच नियामक का काम करता है। ये इन्द्रियां और मन हमारे ज्ञान और कर्म के साधन मात्र न होकर इस संसार को भोगने के भी साधन हैं। संसार का सुख भोगने में मन विचार और कल्पना के द्वारा भी सहायता करता है। मनुष्य का मन संसार की सबसे अशांत चीज है। इस अशांति के कारण ही मनुष्य संसार में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के साधनों की तलाश में भटकता रहता है। लेकिन जैसे ही मनुष्य को अपनी इच्छा की एक वस्तु मिलती है उसका अशांत मन तुरंत किसी दूसरी चीज की तलाश में दौड़ने लगता है। यदि हम मन की सीमा को जानकर उसके ऊपर उठ सकें तो ह...
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